Wednesday, October 21, 2009

जो गुज़र गया वो तो वक़्त था

तेरी आरजू में उडे तो थे
चंद खुश्क पत्ते चिनार के

जो हवा के जोर सो गिर गया
उनमे ये एक खाक-ऐ-सार था,


वो उदास उदास इक शाम थी,
इक चेहरा था इक चिराग था

और कुछ नहीं था जमीन पर
एक आसमां का गुबार था।

जो गुज़र गया वो तो वक़्त था
जो बचा रहा वो गुबार था।

मेरा क्या था तेरे हिसाब में
मेरा साँस साँस उधार था।

- गुलाम अली साहब की एक ग़ज़ल।

1 comment:

Anonymous said...

very profound:)