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Showing posts with the label ग़ज़ल

रुबाईयाँ, शायरी और एक गुजरा साल

आँखियां भी अब निंदियारी हैं , रात के इस घुप्प अँधेरे में। लेकिन सपने जाग रहे हैं , नयी कहानियाँ लिखने नए सबेरे से। *** वे हमारे टूट कर बिखरने का इंतज़ार करते रहे , हम जितनी बार टूटे और मजबूत होते गए। *** उजाले में तो सब साथ होते हैं , कद से बड़ी परछाइयाँ होती हैं... अंधेरे में तो साथ भी नहीं दिखता , खुद के हाथों से रुसवाईया होती हैं। *** चलती साँसों की अठखेली है जिंदगी , मुहब्बत तो यूँ ही बदनाम हो जाती है। *** सच्चा प्यार तो एक स्वयंसिद्ध प्रमेय है , शर्तों और स्वार्थों की सीमाओं से अजेय है। *** रात के अँधेरे में जो न साथ रह सका , वो भरी दोपहरी में छांव मांगता है... *** वक़्त बहुत कम हो गया है लोगों के पास , सबका हिसाब हाथों - हाथ होना चाहिए। ~ अमित श्रीवास्तव  (C) (सर्वाधिकार सुरक्षित)

ये कहाँ आ गए हम यूँ ही चलते चलते।

जमाना हो गया जमाने को देखते देखते,  कभी दिन ढलते, कभी मौसम बदलते...  किन-किनका का बोझ लिए जिया जाये, जिंदगी भी थकी जाती हैं यूँ चलते चलते।  कल आने का एहसास भी अब खास नहीं,  बहुत दिन हो गए, यूँ आज को ढलते-ढलते। सर्द मौसम का असर है न, बसंत का इंतज़ार,  अब बरसों हो गए मौसम बदलते-बदलते।  सब रंगो कर रस अब ऐसे ही जान लेते हैं,  ये कहाँ आ गए हम यूँ ही चलते चलते।   कई रंग देखे लोगों के ऐसे ही मिलते मिलते,  कभी साथ साथ चलते, कभी बगल से निकलते... ~ अमित श्रीवास्तव, 5 जनवरी 2015 लखनऊ, भारत।

एक ही अर्ज है आज इस ज़माने से...

पिछले कुछ दिनों से मेरा आत्म निरीक्षण चल रहा है. सही गलत फैसले, समाज कार्य के अपने समय का ध्यान ना रखना... और जब आप खुद ही Vulnerable और Available बना देते हैं, तो मौके पर चौका तो दुनिया मारेगी ही, किसी से शिकवा नहीं, बस खुद से शिकायत है. इसी को व्यक्त करने के लिए एक शैर लिखा मैंने आज: बस एक ही अर्ज है आज इस ज़माने से, बाज़ आये हमारी खामोशियाँ आजमाने से, यूँ ही सह लिया है दौर-ए-जहाँ के सितम, सीने में ज्वालामुखी है जाने किस ज़माने से! लखनऊ, ९ अगस्त २०१४ 

Dil Kya Chahata Hai...

मर्ज़ भी है पता और दवा भी मालूम है, फिर भी ये दर्द पलना चाहता है। बड़ा नादाँ है ये दिल, ग़म की आग   चाहता है। नादानियों के बिना जिंदगी मुकम्मल कहाँ बड़े शिद्दत से नाकामियों की ओर  चलना चाहता है। लोग सयाने हो गए, रिश्तो का हिसाब लगते हैं कोई गिला नहीं दुनिया से, बस अपनापन बदलना चाहता है। बड़ा नादाँ है ये दिल, अपने ही ढंग में ढलना चाहता है। Marz bhi hai pata aur dawa bhi malum hai... Fir bhi ye dard palna chahta hai.. Bada nadan hai ye dil, Gam ki aag main jalna chahata hai... Nadaniyo ke bina jindagi mukkammal kaha, Bade siddat se nakamiyo ki oor chalna chahta hai... Log sayane ho gaye, Risto ka hisab lagate hain... Koi gila nahi duniya se bas apnapan badlna chahta hai, Bada nadan hai ye dil, Apane hi dhang mein dhalna chahata hai... (Ghazal Composed on 23 Nov 2012, by my introspective blues... ) Sent from BlackBerry® on Airtel

कैसे सेकुलर हो, अपना नाम भूल जाते हो...

भूमिका: गत दिनों मुनव्वर राना साहब NDTV के एक कार्यक्रम पर आये. मैं उनकी शायरी का बहुत बड़ा प्रशंसक हुआ करता था. ये जनाब राय बरेली के हैं, और शायरी में बेजोड़ हैं. अपने समय के शीर्ष शायरों में इनको शुमार किया जाता है.     लेकिन उस NDTV वाले कार्यक्रम में मैंने इनका एक अलग ही चेहरा देखा. जो जिन्ना और तालिबान का मिला जुला प्रतीत हुआ: "तुम्हे हुकूमत मिली तुम गुजरात बनाते हो,  हमें  हुकूमत मिली हम दिल्ली बनाते हैं... हम  औरंगजेब हैं, हम अपनी खिचड़ी खुद पकाते हैं" मुनव्वर साब से ये मुल्लागिरी की उम्मीद नहीं थी. बहरहाल, उनको जवाब मिलना चाहिए: गुजरात याद रखते हो, काश्मीर भूल जाते हो,  कैसे सेकुलर हो अपना नाम भूल जाते हो... पोलिटिकली कर्रेक्ट होना तो बहुत आसान है,  हैरानी है कि हजारों की गयी जान भूल जाते हो... मज़हब की दूकान सरेआम चला लेते हो,  लेकिन अपना फ़र्ज़ और इमान भूल जाते हो... नोआखाली से रावलपिंडी तक कौम बना लेते हो,  और लाखों की गयी जान भूल जाते हो... आगजनी और लूट का अधिकार याद रखते हो,  और अपनी जमीं अपना हिंदुस्त...

दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर

अब किसी को भी नज़र आती न कोई दरार घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार रोज़ अखबारों में पढ़कर यह ख़्याल आया हमें इस तरफ़ आती तो हम भी देखते फ़स्ले—बहार मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ पर कहता नहीं बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके—जुर्म हैं आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फ़रार दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर हर हथेली ख़ून से तर और ज़्यादा बेक़रार                                      -   दुष्यंत कुमार  दुष्यंत  कुमार की यह रचना आज की परिस्थिति के सटीक तरीके से बताती है.  हर जगह झूठ, भ्रष्टाचार और हरामखोरी का आलम है. चोरी भी करते हैं और अपने आप को सही भी ठहराते हैं लोग. उच्चवर्ग उनके साथ है, कोई क्या बिगाड़ लेगा. लेकिन शायद उन्हें यह पता होना चाहिए, कि अब अति हो गयी है...  "दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर हर हथेली ख़ून से तर और ज़्यादा बेक़रार "

कुछ जिंदगी और सही, कुछ चिराग और सही!

बार बार तुमने मेरे दिल को दहलाया, मैं अनाड़ी, फिर भी तुझे दिल से लगाया... अमन की आश में अपनों को गवांया, और मुहब्बत करने तुझे फिरसे बुलाया रकीबों के रहमत पर मेरी जिंदगी है, सब समझ कर भी उनको मिलने बुलाया, कुछ जिंदगी और सही, कुछ चिराग और सही, इस दीवानगी में क्या नहीं लुटाया. दुनिया की बातों का भरम है मुझको, इस शर्म-ए-सार में तुझे दिल से लगाया. बीते कल को भुला, अमन की भीख माँगा था, बदले में फिर से अपनों का खून बहाया.

जो गुज़र गया वो तो वक़्त था

तेरी आरजू में उडे तो थे चंद खुश्क पत्ते चिनार के जो हवा के जोर सो गिर गया उनमे ये एक खाक-ऐ-सार था, वो उदास उदास इक शाम थी, इक चेहरा था इक चिराग था और कुछ नहीं था जमीन पर एक आसमां का गुबार था। जो गुज़र गया वो तो वक़्त था जो बचा रहा वो गुबार था। मेरा क्या था तेरे हिसाब में मेरा साँस साँस उधार था। - गुलाम अली साहब की एक ग़ज़ल।

रुक जायेगी ज़िन्दगी

रुक जायेगी ज़िन्दगी उस दिन, संतुष्ट हो गया मैं अपने से और अपने आप से जिस दिन. क्षुब्ध हूँ निराश हूँ तो जीवित मेरी प्यास है भूखों-नंगो के दुखों से आहत हूँ तो कुछ कर गुजरने की आस है प्रश्न आते रहेंगे, उत्तर खोजता रहूँगा सारे उत्तर मिल गए जिस दिन नए प्रश्न सोचूंगा उस दिन। २१ सितम्बर २००९ © अमित Amit

दुआ माँगी तो दर्द मिला

दुआ माँगी तो दर्द मिला, बहार निकले तो मौसम सर्द मिला. चाह थी दुनिया भर के प्यार की, मतलब के लोग मिले और प्यार का आसमान जर्द मिला. यूँ ही दरियादिल बनने चला था मैं, मुझे जो भी मिला, खुदगर्ज़ मिला! - अमित श्रीवास्तव, १ मई २००९ I did ask for blessings (English translation by author himself.) ---------- I did ask for blessings, but received only pain. when I came out, the weather got cold. I was trying to spread the love around the world, Got the people of means, Found the livid sky of love. I just came to make the flush of affection, In response what I got; got selfish! - Amit Srivastava, 1st May 2009 © अमित Amit

राजनीति का बिगुल बजा है

राजनीति का बिगुल बजा है, शकुनी सारे पिल पड़े हैं. लुटा रहे दोनों हाथो से, राज-मूषको ने बिल भरे हैं. जात धरम पर बाँट रहे ये, अपनी चाँदी काट रहे. पुलिस, न्याय और प्रशासन इनके तलवे चाट रहे. - अमित श्रीवास्तव , ९ अप्रैल २००९ © अमित Amit

ज़न्नत की फ़िकर किसे है

ज़न्नत की फ़िकर किसे है, हमे तो आज बस जी लेने दो. क्या पता मयखाना रहे न रहे, दिल खोल कर बस पी लेने दो. हमने तो देखा है सबेरा होते, वक़्त दिन का तो जी लेने दो. हसीं रात होगी या कयामत होगी, सपने रंगीन तो सी लेने दो. बड़े जुल्म-ए-सितम देखे हैं हमने दो घड़ी तो बेफिक्री जी लेने दो. क्या पता मयखाना रहे न रहे, दिल खोल कर आज पी लेने दो. - अमित श्रीवास्तव , २५ फ़रवरी २००९ © अमित Amit

मैं तेरी राह में चलता गया...

मैं तो तेरी राह में चलता गया यूं रात दिन, मंजिले दर मंजिलें बढता गया मैं रात- दिन। धुप मिले कभी, तो कही छांव के दामन मिले, बस बढता गया मैं मिल के पत्थर गिन-गिन। इस सफर के रास्ते क्या सराय भी सुनसान हैं, यूं चला की ख़ुद को खोता गया मैं दिन- ब- दिन। इस कदर इस राह पर चलता गया मैं रात- दिन, बस रास्ते ही याद थे, भूलता गया मैं रात, दिन। © अमित Amit

'तुम्हारे हैं सदा के लिए!'

आजमा चुके हैं हम उनको, जो कहते थे 'तुम्हारे हैं सदा के लिए!' बहुत कुछ देख चुके हैं हम, नही बचा कुछ वफ़ा के लिए.... पैरों के काटें चुभते रहे हैं, अब गैर याद नही आते दवा के लिए... उस दुनिया को भी आजमा लेना अमित जो पुकारती है शाबा के लिए. जाने से पहले सबको आजमा लेना रह न जाए ये टीस सदा के लिए! - अमित, २० अक्टूबर २००७ © अमित Amit