Monday, January 5, 2015

ये कहाँ आ गए हम यूँ ही चलते चलते।

जमाना हो गया जमाने को देखते देखते, 
कभी दिन ढलते, कभी मौसम बदलते... 

किन-किनका का बोझ लिए जिया जाये,
जिंदगी भी थकी जाती हैं यूँ चलते चलते। 

कल आने का एहसास भी अब खास नहीं, 
बहुत दिन हो गए, यूँ आज को ढलते-ढलते।

सर्द मौसम का असर है न, बसंत का इंतज़ार, 
अब बरसों हो गए मौसम बदलते-बदलते। 

सब रंगो कर रस अब ऐसे ही जान लेते हैं, 
ये कहाँ आ गए हम यूँ ही चलते चलते।  


कई रंग देखे लोगों के ऐसे ही मिलते मिलते, 
कभी साथ साथ चलते, कभी बगल से निकलते...

















~ अमित श्रीवास्तव, 5 जनवरी 2015
लखनऊ, भारत।

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